कठपुतलियों के खेल में
कठपुतलियों के खेल में
अज़ीब खेल है जीवन का
किस डगर ये है जा रहा
देखता हूँ कोई समझे अपने को राजा
इस बात पर वो मुर्ख सा है इतरा रहा
चाहता है सब - कुछ हो हुक्म में मेरे
चाहे मन में उठे किसी के दुःख के अँधेरे
पर वो ये क्यों नहीं है जानता
भूल - भुलैया में उलझे सभी
यहां कठपुतलियों के खेल में
उसको कोई ओर नचा रहा।
अपने घमंड में ऐसा इंसान
क्यों औरों को सताये जा रहा
तू समझता नहीं क्या कुदरत को
उसके समय का पहिया चला जा रहा
सभी मगन है अपने - अपने काम में
फिर भी तू उन पर अपनी धौंस जमा रहा
मत समझना तू पागल किसी को
तेरा पागलपन हमको समझ आ रहा
लगता है तू किसी ओर का धमकाया हमको
जो तू कठपुतलियों के खेल में नचाया रहा।
तू भी दिल - दिमाग से जान ले आख़िरी बात
क्यों दूसरों को तू अपनी औकात दिखा रहा
साफ़ झलकता है तेरे चेहरे पर हमको
क्यों किसी ओर के डर में सबको डरा रहा
जीवन चक्र के फ़लसफ़े का
क्या तुमको जरा सा भी अहसास ना रहा
सभी के ऊपर एक ही है मालिक
उसके सिवा आजतक कोई दूजा ना रहा
बग़िया के मालिक की ही है मर्जी
जो कठपुतलियों के खेल में सबको नचा रहा।
