" क्षितिज के तारे "
" क्षितिज के तारे "
यह मानता हूँ
कि हम सारे ही
एक क्षितिज
के तारे हैं
गिनना आसान
नहीं
सब के सब
आसमान
के चमकते सितारे हैं
कोई बड़ा
ना कोई छोटा
सबके सब
लोगों को प्रकाश
देते हैं
भूले हुए राही को
अंधेरी
निशा में
दिशा दिखा
देते हैं
पता नहीं
कब ये
मलिन होते हैं ?
कर्तव्य पथ पर
अडिग रहकर
कर्तव्य सदा
करते हैं
इनमें ध्रुबतारा
और सप्तऋषि
श्रेष्ठ रहकर भी
सबके
साथ रहते हैं
कभी इनमें
शायद ही
कोई मतांतर ,
अवहेलना ,
अशिष्टता
की बातें करते हैं
व्यथा इनको
भी होती है
जब ये टूटते हैं
पर टूटने का
कभी लोगों को
संदेश नहीं देते हैं
पर हमें देखके
अपनो में
बातें जरूर
करते होंगे
हमारी
अशिष्टता ,
अवहेलना
और
ईगो की बात
करते होंगे
धरा के लोगों में
एक दूसरे से प्रेम
जब तक नहीं होगा
तबतक फिर हमको
इस जहाँ में श्रेष्ठ
बोलो कौन कहेगा ?
