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Mamta Singh Devaa

Abstract Inspirational

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Mamta Singh Devaa

Abstract Inspirational

' कोयला बनाम हीरा '

' कोयला बनाम हीरा '

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तुम इतना जल कर क्या करोगे

अपने रंग को और ज्यादा गहरा करोगे,

क्या कहा ? रंग तुम्हारा साफ है

लेकिन हरकतें तो बड़ी मज़ाक हैं,


हर बात पर इतना क्यों जल जाते हो

माशा अल्लाह फिर भी गोरे ही कहलाते हो,

अगर तुम्हारी जलन चमड़ी पर आ जायेगी

फेयर एण्ड लवली भी कुछ ना कर पायेगी,


तो मियां अपनी जलन थोड़ी कम कर दो

कभी अपना हाथ किसी पीठ पर भी रख दो,

क्या रखा है बेवजह यूँ जलने जलाने में

काम लेना इसका बर्फ को पिघलाने में,


अंदर की आग मुई बड़ी घातक होती है

धीरे - धीरे दीमक की तरह चाट जाती है,

ये घातक आग दो तरह से काम करती हैं 

एक अंदर से तो दूसरी बाहर से जलाती है,


पहली मुफ्त तो दूसरी बेशकीमती होती है

पहली तो बेकार में दूसरी दाम देकर मिलती है,

पहली मुफ्त में होने के बावजूद सब नहीं लेते

दूसरी को लेने के लिए घुटने तक हैं टेकते,


और तुम हो की बात - बात में जले जाते हो

अंदर से कोयला उपर से हीरा कहलाते हो,

अरे ! असली हीरा तो अंदर से बनते हैं

बाहरी हीरे को तो पत्थर कहते हैं,


मन से जल कोयला बन राख हो जाओगे

अंदर से बने तो दिल से हीरा कहलाओगे।


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