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Shivanand Chaubey

Tragedy

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Shivanand Chaubey

Tragedy

किसान

किसान

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है किसान वो बदनसीब

दर्दो में जीवन जीता है

दिल में संजोकर वेदनाये

अश्को को अपने पीता है।


पेट भरे जो सबका खुद

ही भूखे पेट वो सोता है

अंदर ही अंदर पीर सहे

अपनी किस्मत पे रोता है।


उसको भी सुख से जीवन

जीने का हक है

पर विधना ने उसके

कैसे लेख लिखे।


जब सबके घर खुशियों

की मने दिवाली है

तब उसके घर गम का

दीपक जलाता है।


गर्मी वर्षा शीतल सहे

हर मौसम को

पर अपने खुशियों

के मौसम को खोता है।


नमन तुम्हे धरती के पुत्र हे

वंदन शिवम ये करता है

श्रद्धा भाव समर्पित करता

अभिनंदन ये करता है !


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