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मिली साहा

Abstract Tragedy

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मिली साहा

Abstract Tragedy

किसान का दर्द

किसान का दर्द

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पेट भरता है जो देश का अन्नदाता कहलाता है

खुद भूखा सोता वो अभावों में जीवन जीता है

फसल उगाने को पूरे वर्ष परिश्रम वह करता है

अनाज की पूर्ति हो सके इतनी फसल उगाता है

कड़ी मेहनत करने पर भी फल नहीं मिलता है

कर्ज के तले दबकर वह जीवन भर रह जाता है

फसल अच्छी ना होने पर पूरी तरह टूट जाता है

हल न कोई मिलने पर जीवन खत्म कर देता है


उसके कच्चे घर की छत बरसात में टपकती है

फिर भी बादल आ जाए यही आस उसे रहती है

कभी-कभी खड़ी फसल पे ओला गिर जाता है

किसान की पूरी मेहनत को बर्बाद कर जाता है

ना जाने किस गुनाह की सजा किसान पाता है

उस गरीब के दिल का हर अरमान जल जाता है

साल भर किसान खेत में खून पसीना बहाता है

फसल की खातिर मकान भी गिरवी रख देता है


टूटा-फूटा घर उसका दो वक्त की रोटी खाता है

अपने बुरे हालातों से जीवन भर लड़ता रहता है

देश हमारा हर साल इतनी तरक्की कर रहा है

पर किसानों की दशा का नहीं सुधार हो रहा है

फसल अच्छी फिर भी दाम पूरा नहीं मिलता है

बीच में भ्रष्टाचारी इसका पूरा फायदा उठाता है

इतनी मेहनत करके भी हक नहीं मिल पाता है

अन्नदाता होने पर भी किसान गरीब रह जाता है

देश की हर थाली तक अन्न किसान पहुंचाता है

किन्तु उसके बच्चे का ही पेट खाली रह जाता है

नफा नुकसान छोड़ो लागत भी ना मिल पाती है

फंदे पर लटक जाए तो भी शोहरत ना मिलती है


हर साल क्रिकेट खिलाड़ी करोड़ों में बिकता है

पर किसान की मेहनत का मोल नहीं मिलता है

काश किसानों का भी कोई आईपीएल हो जाता

तो आज देश का पेट भरने वाला भूखा ना सोता

शराफत नहीं जिधर देखो उधर बेईमान खड़े हैं

परिश्रम का फल नहीं सड़क पे किसान खड़े हैं

ऐसे हालात में क्या किसान विकास कर पाएगा

या जीवन भर कर्ज के तले दबे वह रह जाएगा।



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