"खुदी से रिश्ता"
"खुदी से रिश्ता"
जाऊं तो में आज कहां जाऊं?
किसको अपने जख्म बताऊं
हर रिश्ते में स्वार्थ नमक पाऊं
जख्मों पर मरहम कहां से लाऊं
क्या सब आईने ही तोड़ जाऊं?
जिसमें में नकली अक्स पाऊं
अपना दुःखड़ा किसे, में सुनाऊं
हर कान में तो कच्चा ही पाऊं
कैसे में आज आनन्द को पाऊं?
हर तरफ ही बेईमानों को पाऊं
किधर जाकर में आज नहाऊं
जिससे खुशियों को पा जाऊं
क्या गंगा में स्नान करने जाऊं?
नहीं साखी, उसे भी दुःखी पाऊं
उसमें गंदगी देख रोता ही जाऊं
लोगों के पाप उससे कैसे हटाऊं
व्यर्थ क्यों रिश्तों में कहराऊं?
जबकि हर रिश्ते में झूठ पाऊं
क्यों न वो साये में भूल ही जाऊं
जिसमें में तो भूत ही भूत पाऊं
एक बार क्यों न सत्य लौं जलाऊं
जिसमें झूठे रिश्तें राख कर जाऊं
बस एकबार खुद को पहचान जाऊं
ओर छद्म रोशनियों को मिटा जाऊं
व्यर्थ क्यों रिश्तों को में ढ़ोता जाऊं
क्यों न आज, बेबस रिश्ते तोड़ जाऊं
आज में तो अंगारों पर जश्न मनाऊं
बस एकबार खुदी से रिश्ता जान जाऊं
