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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Inspirational

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Inspirational

"सब्र रखने का हुनर"

"सब्र रखने का हुनर"

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सब्र रखने का सीख ले तू हुनर

बुरे दौर का जायेगा, वक्त गुजर

जो हंस रहे, बिना बात तुझ पर

एकदिन वही लोग आएंगे, तेरे घर

उन्हें अपनी करनी से, तू चुप कर

अपने इरादों में डाल दे, वो नजर

चीर दे वो पत्थर तक का जिगर

छूना है, आसमां तक का शिखर

खामोशी से बस तू परिश्रम कर

एक दिन सफलता होगी इस कदर

रब भी बोलेगा बेटा क्या दूँ, तुझे, वर

यह जिंदगी तो है, बहुत बड़ा समर 

सब्र से बड़ा नहीं कोई शस्त्र सुंदर

सब्र का तभी मीठा होगा, फल नर

जब तू खुद को बनायेगा, सब्र शजर

जब होगा, तू सब्र पसीने से तरबतर

तब बनेगा तू एक कोहिनूर पत्थर

सब्र रखने का सीख ले, साखी हुनर 

इसके आगे झुकते हिमगिरि जैसे सर

दरिया की कितनी ही गहरी हो, लहर

प्यास बुझाता है, नदियां का जल मगर

सब्रशील आदमी ही बनता है, निर्झर

उसका ही जल प्यास बुझाता, घर-घर

जो सब्रशील होकर, चलते अपनी डगर

वो एकदिन अवश्य झुका देते है, अम्बर



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