STORYMIRROR

Archana Saxena

Tragedy

4  

Archana Saxena

Tragedy

जलियाँवाला बाग

जलियाँवाला बाग

1 min
318

उमंग और उल्लास का होता बैसाखी त्योहार

नयी फसल का भी दे जाता

हम सबको उपहार

दर्ज मगर तारीख यही इतिहास के पन्नों पर भी 

बड़ा ही काला दिन था वह

उस दिन भी थी बैसाखी

सन उन्नीस सौ उन्नीस था

निर्दोष दिये गए मार

इक जालिम अंग्रेज ने कर डाला था नरसंहार

शान्ति पूर्ण सभा थी चलती

जलियांवाला बाग में

खबर मिली दुष्ट जालिम को

घुस आया वह बाग में

जनरल डायर नाम था उसका

हम तो कहेंगे राक्षस

सारे रास्ते बंद कर दिये

एक ही खुला था बस

उस पर भी वह स्वयं खड़ा था

लेकर राक्षसी सेना

जो बेचारे भागे उधर

उनको गोलियों से भूना

जान बचाने कूद पड़े फिर

वह सब कुयें के भीतर

लाशों से पट गया कुँआ फिर

भर गया नीचे से ऊपर

ऊधमसिंह एक शेर हमारा

अपनी आँख सब देखा

बदला इसका लेना ही है 

मन में करी प्रतिज्ञा

सजा अपराधी को देने वह

लंदन तक जा पहुँचे 

बीस बरस में आया मौका

पर वह नहीं थे चूके

जलियाँवाला बाग में बाकी अब भी सभी निशानी

 मासूमों की निर्मम हत्या की वह सुनाये कहानी

सौ बरस से हुये हैं ऊपर अब तो इस घटना को

पर अब भी हम भुला सके ना

व्यथित करे यह मन को

बैसाखी त्योहार के लिये दिल हर्षित है होता

जलियांवाला बाग के लिए पर यह आज भी रोता।


Ballad

#SMBoss


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy