जिंदगी, आना कभी मेरी चौखट पर
जिंदगी, आना कभी मेरी चौखट पर
जिंदगी, मेरी जर्जर कुटिया पर कभी आना
दिखाऊंगा तुझे अपनी ग़रीबी का ताना-बाना
मेरे जज्बातों के तालाब का सूख गया पानी है
तेरी लिखी पटकथा से निकली मेरी कहानी है
जिंदगी, देख मेरी दुर्दशा तू परेशान मत होना
टपकती छत के हालात पर तू हैरान मत होना
मेरे आँगन से गुज़रती शाम आज भी सुहानी है
मगर सूरज की आग में झुलसती मेरी कहानी है
जिंदगी, तारों से गुफ़्तगू करके रातें काटता हूँ
चंद खुशियाँ उधार लेकर अपने दर्द बाँटता हूँ
कल जो गुजर गया बात हो गयी अब पुरानी है
वक्त की परतों में धूल फांकती मेरी कहानी है
जिंदगी, माना कि मेरी लाचारी पर तू भी मौन है
मगर ये बता जिसने तक़दीर लिखी, वह कौन है
उलझनों में उलझकर गुजर गयी यहाँ जवानी है
तेरी साजिशों की कोख से उपजी मेरी कहानी है
जिंदगी, घर की दीवारें भी अब रंग बदलने लगी है
तेरी बेरुखी से दिल की ख्वाहिशें पिघलने लगी हैं
नयनी से टप-टप गिरते आंसू तेरी ही मेहरबानी है
मजबूरियॉं की सलवटों में सिमटी मेरी कहानी है ।
