जीने का फ़लसफ़ा
जीने का फ़लसफ़ा
ज़िंदगी की लौ
गर बिखर जाए,
तो चलो फिर से
उसे संजोय जाएगा,
हर उदासी को
एक नई रौशनी दे,
ये शाम गहरी हो
मगर,
धूप में न खोने पाएगा।
अंधेरों से कहो,
उन्हें लौट के जाना होगा।
जो भी बिखर गया हो,
उसे फिर से हमें जोड़ना होगा।
हो कितने भी
गिले शिकवे शिकायतें ,
दिल से हमें उसे मिटाना होगा।
ज़िंदगी रूठे तो रूठे क्यों,
प्यार से उसे फिर मनाना होगा।
कुछ लम्हे हैं जिन्दगी के
साज़-ए-दिल उसे बनाना होगा।
इन खामोशियों में भी
इक गीत हमें सजाना होगा।
उम्र कटती रहे यूँ ही
तो इसके मायने क्या हैं।
हर घड़ी को प्यार से जीना ही
जीने का फ़लसफ़ा होगा। —
