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Uma Shankar Shukla

Tragedy


5.0  

Uma Shankar Shukla

Tragedy


सन्नाटों की शाम

सन्नाटों की शाम

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सन्नाटों  की  शाम  हमारी  बस्ती में ।

लोकतंत्र  बदनाम  हमारी  बस्ती में ।।


लिए हाथ में आग  हवाऐं डोल रहीं,

मचा हुआ कोहराम हमारी बस्ती में ।


जली-जली झोपड़ियों के चेहरे बोले, 

वहशी हुआ निजाम हमारी बस्ती में ।


भूँख प्यास की तपन लिए फुटपाथों पर,

 सोया  हुआ  अवाम  हमारी  बस्ती  में ।


जबसे उगे मरुस्थल मन की आँखों में ,

दंगे   कत्ल-ए-आम   हमारी  बस्ती  में ।


सत्ताधारी  भाग्य  विधाता  बँगलों  में,

टकराते  हैं  जाम ,   हमारी  बस्ती  में ।


गिद्धों के प्रतिविम्ब देखकर सूख गए,

बरगद  पीपल  आम, हमारी बस्ती में ।


सुन्न सिराओं में नफरत के विष फैले, 

प्यार  हुआ  नीलाम , हमारी बस्ती में । 

      


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