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Surendra kumar singh

Abstract Inspirational

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Surendra kumar singh

Abstract Inspirational

जब हम

जब हम

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जब हम अपने अंदर के

जलते हुए दीये को

हथेली पर ले

निकलते हैं जीवन युद्ध में

तो क्या क्या फिकरे सुनते हैं।

मसलन दीवाना है

बुद्धू है जाहिल है फकीर है

मूडी है।


क्या क्या देखते हैं

आज के इस अभूतपूर्व

घने अंधेरे के जंगल में,

एक तो रात और दिन का फर्क

शेष नहीं रह जाता,

धर्म और अधर्म के बीच

इंसानियत की लकीर

स्पष्ट दिखने लगती है,

सत्य और असत्य के बीच

एक अग्नि रेखा

धधकती हुयी दिखने लगती है,

और तमाम नकाब लगाये

चेहरों के अंदर का चेहरा

दिखने लगता है।


लगने लगता है समय ने

अपने ऊपर सदियों से जमी

नजरिये की धूल को

झाड़ दिया है,

और महसूस होने लगता है

लोग समझते हैं कि

हम सिर पर कफ़न बांधे निकले हैं

या कह लीजिए कि प्राण हैं हथेली पर

इस देखने सुनने के विभ्रम का

एहसास इतना सा ही है कि

हम अपने ही अंदर के

अनवरत जलते हुए दीये को

अपनी हथेली पर लिये

चहलकदमी कर रहे हैं

अपनी ही दुनिया में।


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