STORYMIRROR

Kavita Sharrma

Abstract

3  

Kavita Sharrma

Abstract

जाल

जाल

1 min
384

मानव जीवन भी इक जाल सा है

जितना निकलने की कोशिश करो

उतना ही उलझता जाता है

तृष्णाओं के पीछे-पीछे 

अंतहीन भागता ही जाता है

कबर में लटके हैं पैर पर इच्छाएं

तो अभी जवान है

हाय रे मनुष्य तेरी ऐसी जिंदगी बड़ी नाकाम है.


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract