इश्क़ की वह पहली मुलाक़ात
इश्क़ की वह पहली मुलाक़ात
हमारी पहली-पहली मुलाक़ात के अंतिम पल
जब नज़दीक आने लगे तो
मैंने पूछा उनसे, इस पहली मुलाक़ात में
तुमको क्या भेंट करूँ
पहले तो वह सकुचाई, फिर मुस्कुराई
फिर सहमी-सी पलकें गिराकर
अपनी उलझी लट को संवारते हुए धीरे से बोली
अगर कुछ मांगू, बुरा तो नहीं मानोगे
जवाब था मेरा, कुछ मांग कर तो देखो
आषाढ़ का ये महीना था
आकाश में श्यामल बादल घिर आये थे
बारिश की हलकी बूँदें बदन को छू कर
धरती को नम करती
मेरी आँखों की गहराई में झांककर कहा उसने
अगर इतना चाहते हो तो
बस एक बार मुझे अपनी ज़िन्दगी बना लो
इतना कहकर लज़्ज़ा से
मेरी बाहों में समा गई, अचानक आसमान में
जैसे बिजलियाँ कौंधने लगी, शांत बादल गरजने लगे
बूंदों की जगह मूसलाधार होने लगी
मेरी सांसें अनायास ही जैसे थम गई हों
धड़कनों की रफ़्तार बढ़ गई थी
शाम की लालिमा धूमिल पड़ने लगी और अँधेरा
भी काली चादर लपेटे झाँक रहा था
जिंदगी भर न भूलेगी, इश्क़ की वह पहली मुलाक़ात।

