इश्क़
इश्क़
वो कहते हैं अक्सर हमसे
इन हवाओं को लड़ने दो न ज़ुल्फों से अपनी
अपने हाथों से तुम इन्हें सुलह क्यों कराती हो
कर लेंनें दो इन हवाओं को इन्हें छूकर ख्वाहिश अपनी पूरी
तुम बेवजह इन्हें क्यों सुलझाया करती हो
खूबसूरती में चार-चांद लगाता है तुम्हारे गालों का ये तिल
मुस्कुराकर धीरे से तुम दिल पर नश्त़र चलाती हो
सुर्ख़ होंठों का रंग देखकर लगता है कुछ ऐसा
बाग के हजारों गुलाबों को इन्हीं से रंग बांट आती हो
आंखों का काजल जैसे दरिया का वो किनारा
बच न पाया इनमें डूबने से जब आंखों से बातें तुम कर जाती हो
नहीं जाता मयकशी करने मैं मयखाने फिर भी नशें में हूं
नशीली आंखों से अपनी जाने कौन सी शराब तुम पिलाती हो।

