हुस्न–ए–दीवानगी
हुस्न–ए–दीवानगी
तिल जो रुखसार पर तेरे आहें भरता है
कोई फूल सूरजमुखी का चमन में खिलता है
है कोई कसर बाकी इस जहां में लेकिन
तेरे चेहरे के बाद सुबह का सूरज खिलता है।
हमने तो समेट ली सारी ख्वाहिशें दिल में
तुम हो कि आईने के उस पार खिलता है।
सज भी जाए कोई बज़्म–ए–ज़ानां रोज़–ए–शब में अब
तेरी दीवानगी का कहर गुलिस्तां बनकर जन्नत में खिलता है।

