हल चल.......
हल चल.......
कभी गम कभी खुशी की कशमकश में फँसा मन,
अपने आप को पूछा क्यूँ ये होता है हर दम?
खुशी तो आती है पर टिकती नहीं,
गम जब आता है जाता नहीं,
जब ये दोनों टकराते है कुछ हलचल मचता,
मैं देखता हूँ पर कुछ नहीं कर पाता,
तब अपने साथियों से पूछने की सोचता,
पर कोई भी मेरे तरफ नहीं देखता,
वक़्त उसके रास्ते अपने रफ्तार में चलते ही जाते,
इशारों इशारों में सोच बदलने का कह जाते,
तब मैं सोचूँ कर्म ही है जो सब करता,
काश, सतकर्म करके सतमार्ग में जाता,
ये खुशी और गम की कशमकश में नहीं फँसता .....
मन की बात जब दिल तक पहुंची ,
दिल परखने लगा ये इतनी हलचल क्यूँ मची,
पहले से ये तय था कुछ गड़बड़ी मची ?
मैं तो नाज़ुक हूँ मेरे साथ कभी ये रचा,
वक़्त और काल साथी मेरे है बहुत सच्चे ,
इसीलिए खुशी और गम की कशमकश में
हलचल नहीं मची....
ये तो सच है मन बड़ा चंचल है,
कभी किसी को भूलता नहीं है,
सबको अपनाता कोई पराये नहीं है,
सही गलत की फिकर नहीं है,
वो तो सोच और कर्म के बस में है,
पर दिल तो बिलकुल अलग है,
सोच सोच के किसी को बिठाता है,
अच्छे बुरे की समझ भी है,
वो नाज़ुक है पर नासमझ नहीं है,
जब तक साथ है ज़िन्दगी चलता है,
मन को भी कभी उसकी बात मानना है,
सही सोच को अपनाना है,
अगर खुशी और गम की हलचल से मुक्त होना है....
