STORYMIRROR

Rishabh Katiyar

Tragedy

4  

Rishabh Katiyar

Tragedy

हाल दिल का अपने सुनाऊं कैसे

हाल दिल का अपने सुनाऊं कैसे

1 min
400

हाल दिल का अपने सुनाऊं कैसे

इस दिल से उसको भुलाऊं कैसे 

जख्म जिस्मों के दिख ही जाते हैं

घाव रूह के दिखाऊं कैसे

हाल दिल का अपने सुनाऊं कैसे


स्याह रात भी रोशन थी कभी

ये बात उसको बताऊं कैसे

खामोशी समझती थी वो कभी

अब धड़कन दिल की उसे सुनाऊं कैसे

हाल दिल का अपने सुनाऊं कैसे

इस दिल से उसको भुलाऊं कैसे

हाल दिल का अपने सुनाऊं कैसे


सुबह से शाम, शाम से सुबह हो जाती थी कभी

वो अनगिनत अनकही बातें

सभी को बताऊं कैसे

उसकी यादों से खुद को मिटाओं कैसे

हाल दिल का अपने सुनाऊं कैसे

इस दिल से उसको भुलाऊं कैसे


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy