गठबंधन
गठबंधन
क्या है पाणिग्रहण संस्कार !
इंसान है तो बंधे इस संस्कार से
वरना जीव-जंतु ,
पशु-पक्षी कहाँ बंधे इस संस्कार से
पर फिर भी निभाते रिश्ते इंसान से।
इंसान भूल चला अपनी परंपराएँ
शादी तो दो दिन का खेल मात्र
नृत्य-गान , खान-पान बस
रह गए ये ही पाणिग्रहण संस्कार।
परिणय भरा आडंबरों से,
परिजन सजे पोशाकों से,
प्रदर्शनी ससुराल के बारातियों से ,
प्रेम-विवाह या व्यवस्थित विवाह
सब संतुष्ट होते फेरों से ,
पर दूसरे ही पल भूल जाते रस्में-कस्में ,
रह जाती बस तू-तू , मैं-मैं की झड़पे,
यह ही रह गया अब परिणय।
आज रह गई यह विवाह वेदी
कहीं तो तोल-मोल का बाजार ,
कहीं ईश्क की जीत का जश्न ,
कहीं कन्यादान की रस्म वेदी ,
कहीं हवन-सामग्री की आहुति ,
कहीं अग्नि में होम करते सुख-वैभव ,
कहीं सात वचनों की गूँजती श्रुतियाँ।
जाने-अनजाने कितने रीति-रिवाजों से
भरी रह गई यह विवाह वेदी।
यह गठबंधन
दो जीव का बंधन।
बंधन नहीं ये
रीति-रिवाजों का
कसमें-वादों का।
ये तो सफर
दो जिस्म एक जान का।
न तेरा न मेरा
ये रिश्ता है
मैं से हम में परिवर्तित होने का।
एक दूसरे में
आत्मसात हो कर्म करने का।
हर कर्म को
गाँठ बाँध अग्रसर होने का।
इस सृष्टि को आगे बढ़ाने का ,
संतुलन रख , इस प्रकृति में
सौम्य भाव अर्पण करने का।
सर्वसुंदर,सर्वश्रेष्ठ ,प्रेममय है
यह गठबंधन।
