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Sudershan kumar sharma

Tragedy Others

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Sudershan kumar sharma

Tragedy Others

गजल(जख्म)

गजल(जख्म)

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पुराने जख्म फिर से हरे होने लगे हैं, 

वर्षों से सूखे पड़े थे जो फिर से बहने लगे हैं। 


छुपा के रखा था दर्द जिनका

कई वर्षों तक आज फिर से

सारी कहने लगे हैं। 


खो बैठे थे रंगत यूं काले पड़ गये थे, 

चुभन ऐसी लगी सुदर्शन फिर से बहकने लगे हैं। 

ताजा हूं अभी तक हर जख्म कहने लगा,

अजमा कर देखा तो हरेक पुराना ही लगा। 


धोखेबाज बनकर चन्द लोग

फिर से सियासत करने लगे हैं, 

होकर शर्मिंदा  दिख न जाए

फिर से उनको ढकने लगे हैं। 


कभी न भूल पाएंगे जिन्हें

यह समझ कर फिर से उन 

जख्मों की तिजोरी भरने लगे

हैं। 


मत दिखाओ जख्म किसी को अपना समझ कर वो ही

उनको कुरेदने लगे हैं, 

सहता चल हर जख्म को

खुद ही जिसे सब कुरेदने 

लगे हैं, भर जाएंगे समय

आने पर, बेगाने क्यों पीछे पड़े हैं। 


धूप और छाया दस्तूर है जिंदगी का

फिर क्यों अब तक पीछे पड़े हैं, 

जब न्याय ही प्रभु के पास

है हर जख्म का फिर क्यों

लोग न्यायाधीश बने हैं। 



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