एक शांत उपस्थिति की स्मृति”
एक शांत उपस्थिति की स्मृति”
प्रिय तुम,
कुछ पत्र
समय पर नहीं लिखे जाते।
वे वर्षों तक
मन की किसी अँधेरी अलमारी में पड़े रहते हैं—
जैसे कोई पुरानी डायरी
जिसके पन्नों पर
धूल से अधिक
स्मृतियाँ जमा हो जाती हैं।
यह पत्र भी
शायद
उन्हीं में से एक है।
शायद
इसे कभी भेजा नहीं जाएगा।
क्योंकि कुछ शब्द
किसी तक पहुँचने के लिए नहीं लिखे जाते—
वे लिखे जाते हैं
ताकि मनुष्य
अपने भीतर की चुप्पी
सुन सके।
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मुझे याद है
पहली बार
जब मैं तुमसे मिला था।
कुछ असाधारण नहीं हुआ था।
न कोई संकेत।
न कोई घटना।
फिर भी—
समय
एक क्षण के लिए
रुक गया था।
जैसे घड़ी ने
अपनी ही टिक-टिक पर
संदेह कर लिया हो।
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उससे पहले
जीवन
एक लंबी दौड़ था।
कुछ पाने की बेचैनी।
कुछ बनने की हड़बड़ी।
और यह भ्रम—
कि मनुष्य की कीमत
उसकी उपलब्धियों से तय होती है।
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लेकिन तुम्हारे भीतर
एक अलग ही लय थी।
शांत।
गहरी।
लगभग अदृश्य।
तुम
छोटी-छोटी चीज़ों के सामने
रुक जाती थीं—
शाम की रोशनी,
पेड़ों से छनती हुई धूप,
बारिश की वह ध्वनि
जो छतों पर गिरते-गिरते
बचपन लौटा लाती है।
और वह चुप्पी—
जहाँ
शब्द
अनावश्यक हो जाते हैं।
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तब
मुझे लगता था
यह सब साधारण है।
आज समझ आता है—
साधारण होना
सबसे कठिन कला है।
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तुमने
कोई उपदेश नहीं दिया।
कोई दर्शन नहीं समझाया।
फिर भी
तुम्हारे होने से
बहुत-सी बातें
स्पष्ट हो गईं।
धीरे-धीरे
मैंने जाना—
जीवन उतना जटिल नहीं
जितना हम
उसे बना लेते हैं।
हम ही
अपने भय,
अपनी अपेक्षाओं,
और अपने भ्रमों से
उसे उलझा देते हैं।
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तुमने मुझे
कोई उत्तर नहीं दिए।
तुमने बस
कुछ प्रश्न
मुझमें जगा दिए।
और शायद
यही
सबसे बड़ी शिक्षा होती है।
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फिर
जैसा हमेशा होता है—
समय ने
अपना काम किया।
हमारी राहें
धीरे-धीरे
अलग हो गईं।
किसी बड़े कारण से नहीं।
बस
जीवन की अपनी दूरियाँ होती हैं।
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एक समय था—
जब तुम
मेरे हर दिन का हिस्सा थीं।
फिर
एक समय आया—
जब तुम
सिर्फ एक स्मृति रह गईं।
लेकिन स्मृतियाँ
अतीत में नहीं रहतीं।
वे
हमारे भीतर
जीवित रहती हैं।
किसी शांत शाम में,
किसी सुनसान रास्ते पर,
किसी पुरानी धुन के साथ—
तुम अचानक
याद आ जाती हो।
और उस क्षण
लगता है
तुम कहीं गई ही नहीं।
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जैसे तुम
अब भी
मेरे भीतर कहीं मौजूद हो।
मौन में।
शांत।
अदृश्य—
पर जीवित।
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कभी-कभी
मैं सोचता हूँ—
शायद जीवन में
कोई भी मुलाक़ात
सिर्फ संयोग नहीं होती।
कुछ लोग
तूफ़ान की तरह आते हैं।
बहुत कुछ बदलकर
चले जाते हैं।
और कुछ लोग—
आकाश की तरह आते हैं।
वे शोर नहीं करते।
वे बस
मौजूद रहते हैं।
और धीरे-धीरे
उनकी उपस्थिति में
जीवन
अपने आप संतुलित होने लगता है।
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तुम
मेरे जीवन में
वैसी ही एक उपस्थिति थीं।
यह पत्र
अतीत को वापस बुलाने के लिए नहीं है।
समय
लौटकर नहीं आता।
यह केवल
एक स्वीकृति है—
कि जीवन की इस लंबी यात्रा में
मैंने एक बार
ऐसी शांति को जाना था
जो किसी उपलब्धि में नहीं
किसी मनुष्य की उपस्थिति में थी।
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और उसके लिए—
मैं आभारी हूँ।
क्योंकि कृतज्ञता
वह प्रकाश है
जो स्मृतियों को
कभी बुझने नहीं देता।
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शायद
जीवन का गहरा अर्थ
किसी विजय में नहीं होता।
वह अक्सर
उस शांति में छिपा होता है
जो हमें
किसी के साथ
चुपचाप बैठने से मिलती है।
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तुम
मेरे जीवन में
वैसी ही एक शांति थीं।
और इसलिए—
यह मौन
आज भी
तुम्हारा ऋणी है।
— अशोक भटनागर
