प्रश्नों के उस पार — यशोधरा का मौन
प्रश्नों के उस पार — यशोधरा का मौन
रात थी—
पर वो सिर्फ़ एक रात नहीं थी,
वो एक युग की आख़िरी साँस थी,
एक अंत…
और किसी अनदेखे सत्य की आहट।
आकाश स्थिर था,
तारे जैसे ध्यान में लीन—
जैसे सृष्टि ने खुद को
एक क्षण के लिए थाम लिया हो।
पर उस मौन के भीतर—
एक स्त्री का संसार
धीरे-धीरे टूट रहा था…
दीपक की लौ काँप रही थी,
सिर्फ़ हवा से नहीं—
वो किसी अनकहे बिछोह की
थरथराहट थी।
यशोधरा जागी—
नींद नहीं टूटी थी,
कोई भ्रम टूटा था भीतर।
उसने हाथ बढ़ाया—
पर वहाँ…
सिर्फ़ शून्य था।
एक ऐसा खालीपन,
जो डराता नहीं,
बल्कि भीतर तक खोल देता है।
“सिद्धार्थ…”
उसके होंठों से निकला—
पर उत्तर में
मौन ही था।
बिस्तर खाली था,
और उस खालीपन में
एक जीवन भर का प्रश्न गूँज रहा था।
अब उसकी आवाज़ में
प्रेम कम, प्रश्न अधिक थे—
और प्रश्न…
हमेशा भीतर के दरवाज़े खटखटाते हैं।
वो उठी—
उस दरवाज़े तक पहुँची
जो अब लकड़ी नहीं था,
एक सीमा था—
माया और मोक्ष के बीच।
दरवाज़ा खुला था—
जैसे कह रहा हो,
“वे जा चुके हैं…
खुद को खोजने।”
वो बैठ गई—
ज़मीन पर नहीं,
अपने ही अस्तित्व के बीच।
आँसू गिरे—
पर वो सिर्फ़ दर्द नहीं थे,
जैसे भीतर की परतें
धीरे-धीरे धुल रही हों।
उसने खुद से पूछा—
“अगर वो पूछते…
क्या मैं रोक लेती?”
मौन ने उत्तर दिया—
“सच्चा प्रेम
कभी रोकता नहीं…
वो बस मुक्त करता है।”
“क्या प्रेम बंधन है?”
उसने फिर पूछा।
मौन और गहरा हुआ—
“प्रेम न पकड़ता है,
न छोड़ता है…
वो बस होता है।”
समय बीतता गया—
पर अब समय
घड़ी की टिक-टिक नहीं था,
एक शांति था
जो भीतर उतरती गई।
उसने भीतर देखा—
न सिद्धार्थ थे,
न विरह।
बस एक गवाह था—
सब कुछ देखता हुआ,
पर अडोल।
फिर एक दिन—
समाचार आया—
“सिद्धार्थ अब बुद्ध हैं…”
उसने सुना—
और इस बार
दिल टूटा नहीं…
खुल गया।
“ज्ञान क्या है?”
उसने सोचा—
“कुछ पाना…
या सब खो देना?”
भीतर से स्वर आया—
“ज्ञान पाया नहीं जाता,
ज्ञान तो बस
खो दिया जाता है…”
उसने आईने में देखा—
चेहरा वही था,
पर पहचान…
गायब।
न पत्नी,
न स्त्री—
बस एक अस्तित्व।
“मैं कौन हूँ?”
प्रश्न फिर उठा—
पर अब उत्तर के लिए नहीं,
स्वयं को मिटाने के लिए।
धीरे-धीरे—
उसने सब उतार दिया—
उम्मीदें,
दर्द,
अहंकार…
जैसे कोई साधु
अपने वस्त्र त्यागता है।
और तब—
वो खाली नहीं हुई…
भर गई।
मुस्कराई—
“उन्होंने संसार छोड़ा…
और मैंने—
संसार को अपने भीतर से मुक्त कर दिया।”
उसने जाना—
त्याग बाहर का नहीं,
भीतर का होता है।
फिर एक शांति आई—
अनकही,
अथाह।
न शिकायत,
न क्रोध—
सिर्फ़ करुणा।
सिद्धार्थ के लिए…
खुद के लिए…
पूरे अस्तित्व के लिए।
मौन में उसने कहा—
“तुम बुद्ध बने…
और मैं—
बुद्धता को छू आई हूँ…”
रात फिर आई—
पर अब वो अंधकार नहीं थी,
वो ध्यान थी।
दीपक की लौ—
अब न काँपती थी,
न बुझती—
जैसे जीवन
स्वयं में स्थिर हो गया हो।
और वहाँ—
उस स्थिरता में—
यशोधरा नहीं थी।
केवल एक गवाह—
जो न जन्मा,
न मरेगा।
न स्त्री,
न पुरुष—
न बंधन,
न मुक्ति—
बस…
होना।
और उसी ‘होने’ में—
पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ है।
