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ashok kumar bhatnagar

Children Stories Fantasy Inspirational

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ashok kumar bhatnagar

Children Stories Fantasy Inspirational

शीर्षक: उस एक प्रश्न के बाद

शीर्षक: उस एक प्रश्न के बाद

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कितना सरल था उसका प्रश्न—
जैसे हवा पूछती हो पेड़ से,
“तुम यहीं क्यों खड़े हो?”
पर मेरे भीतर—
वह प्रश्न एक तूफ़ान बनकर उतरा,
और मेरी जड़ों तक हिल गईं।

“आप हमारे साथ बैंगलोर में क्यों नहीं रह सकते?”
म्यरा ने कहा—
इतनी सहजता से,
जैसे दुनिया में कोई दूरी होती ही नहीं।
और उसी क्षण—
समय ने अपनी चाल रोक दी,
मेरे वर्षों का संचित धैर्य
एक बूँद बनकर आँखों से ढलने लगा,
धीरे… चुपचाप…
जैसे कोई बूढ़ा वृक्ष
अंदर ही अंदर टूटता हो।

पर्व—
मेरा तीन साल का छोटा-सा आकाश,
अपलक मुझे देखता रहा—
उसकी आँखों में प्रश्न नहीं था,
पर एक गहरा ठहराव था,
जैसे वह मेरे मौन को सुन रहा हो,
जैसे वह जानता हो
कि इस शांति के भीतर
एक पूरा संसार बिखर रहा है।

मैं मुस्कुराना चाहता था—
एक दादा की तरह,
जो बच्चों के हर प्रश्न को
कहानी में बदल देता है,
जो हर “क्यों” के बदले
एक “एक बार की बात है…” कह सके।
पर उस दिन—
मेरे पास कोई कहानी नहीं थी,
सिर्फ़ एक सन्नाटा था
जो शब्दों से कहीं अधिक सच्चा था।

मैं उन्हें सीने से लगाकर
रो देना चाहता था—
इतना कि भीतर जमा हर दर्द
आवाज़ बनकर फट पड़े,
इतना कि मेरी चीख
इस दूरी को चीर दे,
इतना कि समय भी
कुछ क्षणों के लिए
हमारे पक्ष में खड़ा हो जाए।

पर मैं रो नहीं पाया—
सिर्फ़ मेरी सिसकियाँ
मेरे भीतर ही कैद रहीं,
जैसे कोई नदी
समुद्र तक पहुँचने से पहले ही
रेगिस्तान में खो जाए,
जैसे कोई गीत
गले में अटककर
सिर्फ़ कंपन बनकर रह जाए।

मेरी आँखें—
वे मेरे विरुद्ध हो गई थीं,
वे सच के साथ थीं,
और सच…
हमेशा नम होता है।

मैं उनके चेहरे—
उनकी हँसी—
उनकी मासूम आँखें—
अपनी स्मृतियों में नहीं,
अपनी आत्मा में संजो लेना चाहता था,
जैसे कोई डूबता हुआ व्यक्ति
आख़िरी साँस को पकड़ लेना चाहता है।
मैं उन्हें अपनी आँखों में
समुद्र की तरह नहीं…
बल्कि उस आख़िरी रोशनी की तरह भरना चाहता था
जो डूबते सूरज से बचा ली जाती है,
ताकि जब अँधेरा पूरी तरह उतर आए,
तो वही एक किरण
जीने का कारण बन सके।

कितना हल्का था उसका स्वर—
पर उस एक वाक्य में
मेरे समूचे जीवन का भार था।
मेरी असमर्थताएँ,
मेरी परिस्थितियाँ,
मेरे बँधे हुए समय—
सब एक साथ खड़े हो गए थे
उस छोटे से “क्यों” के सामने।

मैंने होंठों पर मुस्कान रखी—
बहुत सावधानी से,
जैसे कोई टूटा हुआ पात्र
अपने भीतर का जल बचाने की कोशिश करे।
पर भीतर—
मैं बिखर रहा था,
परत दर परत,
धीरे-धीरे,
बिना किसी आवाज़ के।

मैंने सोचा—
क्या प्रेम का अर्थ
सिर्फ़ पास होना है?
या यह भी कि हम दूर रहकर भी
एक-दूसरे की धड़कनों में बसे रहें?
क्या दूरी
प्रेम को कम करती है—
या उसे और गहरा बना देती है?

पर उस दिन—
मेरे पास कोई दर्शन नहीं था,
कोई उत्तर नहीं था,
सिर्फ़ एक बूढ़ा हृदय था
जो अपने ही स्नेह के भार से
थककर चुप हो गया था।

मैंने उन्हें फिर से देखा—
जैसे कोई यात्री
जाने से पहले
अपने घर को आख़िरी बार देखता है।
उनकी हर मुस्कान,
हर छोटी-सी हरकत,
हर मासूम अदा—
मैं उन्हें समय से चुरा लेना चाहता था,
ताकि आने वाले एकांत में
मैं उन्हें जी सकूँ।

शायद वे नहीं जानते—
कि उनका यह छोटा-सा प्रश्न
मेरे भीतर एक युग बनकर रह जाएगा,
कि उनकी यह मासूम जिद
मेरे दिनों की खामोशी में
धीरे-धीरे गूंजती रहेगी।

और मैं—
बस एक दादा रह जाऊँगा,
जिसकी आँखों में
दो छोटे-छोटे ब्रह्मांड बसते हैं,
जिसकी स्मृतियों में
एक अधूरा घर है,
और जिसकी बाँहों में
एक अनकहा आलिंगन
समय के किनारे बैठा
अब भी प्रतीक्षा कर रहा है—

कि शायद किसी दिन,
कोई दूरी थक जाए…
और कोई “क्यों”
अपने आप ही
उत्तर बन जाए।


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