STORYMIRROR

Payal Meena

Classics

4  

Payal Meena

Classics

एक भिखारिन माँ

एक भिखारिन माँ

1 min
374

फटी हुई साड़ी में अपने दिल के टुकडे को छिपाये 

भटक रही है दर बदर एक भिखारिन माँ

इस आस में की

कही से कुछ मिल जाये और में अपने 

कलेजे के टुकड़े केउदर की पीड़ा जो भूख से बढ़ रही है


उसे शांत कर दुँ 

पर हाय री नियति 

ये दुनिया कितनी निष्ठुर है 

सवेरे से सांझ हो गई पर उस 

बदनसीब के हिस्से एक टुकड़ा तक न आया रोटी का 

और अमीरो के घर रोटियां


कचरे के पात्रो में पड़ी थीक्योकि उनके कलेजो के टुकड़ो 

को पसंद नही आई

खास उस रोटी का एक टुकड़ा उस भिखारिन को मिल जाता

तो उसके कलेजे के टुकड़े का पेट भर जाता।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics