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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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दुश्मनों से दोस्ती

दुश्मनों से दोस्ती

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आज हाथ मिला रहे है, उनसे जिनसे दुश्मनी है

आज गले लगा रहे है, उन्हें जिनसे तनातनी है

कैसी हुई आजकल साखी ये अपनी जिंदगी है

बरसते अंगारे पे हो रही शबनम की बंदगी है

फिर भी अविराम पथ पे अपने चले जाना है,

चाहे खत्म हो रही पल-पल दीये की रोशनी है

कभी तो मिलेगा किनारा,

उलटी लहरों के विरुद्ध जाना है


दरिया से ज़्यादा गहरे तेरे आंसुओं की बंदगी है

फूल, शूलों से भी साखी कुछ न कुछ सीखते है

दुश्मनों से भी हम अपनी बुराई सुनना सीखते है

निंदा करनेवालों से खिलेगी फूल की जिंदगी है

बुरे शख़्स के वार से ही चमकेगी कनक की

कुन्दनगी है

शत्रु पास रहने से सीखेंगे कैसे खत्म करें गंदगी है

कैसे बनाये खुद को तम में सूर्य की एक रश्मि है

अंधेरे से लड़ने से ही जुगनू की चमकेगी जिंदगी है

जलते अंगारों पे चलने से मजबूत होगी जिंदगी है



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