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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Abstract

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

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दुख और निराशा

दुख और निराशा

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दुखी मन मेरे, निराश हो क्यों रोये ?

जीवन पल-पल अठखेलियां दिखाये


धूप कभी छांव दुख-सुख आयें-जायें

जिन्दगी खट्टी-मीठी पहेलियां बुझाये


निराशा होती दुख की अंतरंग सहेली

तू इसे क्यों पल-छिन लगा गले नवेली 


अंधेरे के बाद प्रकाश आता है जरूर

क्यों ढो चली निराशा का झूठा फितूर


रख धैर्य, दुख आखिर कब तक ठहरेगा ?

प्रारब्ध नियन्ता का मन, कभी पिघलेगा 


परिवर्तन तो प्रकृति का शाश्वत नियम  

दुख और निराशा से उबर रख संयम 


निराशा बदली में छिपी, आशा किरण

सुख के बसंत में बदलेगा, दुख पतझड़ 


सुख-दुख जीवन के दो अजब से रंग 

दिया उम्मीदों का रोशन, रख अपने संग


दुखद पतझड़ कर ले, कितना पराक्रम  

सुप्त कलियां फिर खिलेंगी इस उपवन



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