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Ramanpreet -

Romance


5.0  

Ramanpreet -

Romance


दर्पण

दर्पण

1 min 219 1 min 219

कर मन का फूल तुम्हें अर्पण

देखा हमने एक ऐसा दर्पण 


जिसमें सुर्ख रंग बिखरे थे 

और हम तेरे संग निखरे थे


हया झुकी पलकों में छुपी थी

कुछ बातें लबों पे रुकी थी


मन में एक हलचल मची थी

एहसासों की लहरें जो उमड़ी थी


कैसे कहूँ वो कैसी घड़ी थी

जब में दर्पण में सहमी खड़ी थी


परायों में अपनत्व तलाश रही थी

और अपनों से मैं पराई हो चली थी।


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