Neha Yadav
Tragedy
खामोशियों को समेटे
लब कंपकंपाता रह गया
छुपाते रहे हर दर्द, तन्हाई
आंसुओं में सिमट के रह गयी।
यादों की बारि...
देशहित में
घर छोड़ जाने क...
मकाम हैं हम
मैं तुम का भे...
सच्चाई
वो पहली मुलाक...
विश्वास
संवेदनशील नार...
है वही दिन,रात का रोना। वही दरके हुए गाने, वही रूठा जमाना। है वही दिन,रात का रोना। वही दरके हुए गाने, वही रूठा जमाना।
कुछ टूट रहा था, कुछ छूट रहा था, लेखन से नाता टूट रहा था। कुछ टूट रहा था, कुछ छूट रहा था, लेखन से नाता टूट रहा था।
आज फिर एक माँ, आस के दीप जलाये गुमनाम हो गई। आज फिर एक माँ, आस के दीप जलाये गुमनाम हो गई।
यह शहर है यह रोने की जगह नहीं है। यह शहर है यह रोने की जगह नहीं है।
एक शिकायत है तुझसे माँ,क्यों मुझे ब्याह दिया विदेस? एक शिकायत है तुझसे माँ,क्यों मुझे ब्याह दिया विदेस?
दूर देश से बेशकीमती,नक्काशीदार पिंजरा मंगवाया। दूर देश से बेशकीमती,नक्काशीदार पिंजरा मंगवाया।
ना करो तुम हमको ऐसे रुखसत यूँ अपनी इन भीगी पलकों से। देखना फिर नया ख्वाब बनकर आएंगे एक ना करो तुम हमको ऐसे रुखसत यूँ अपनी इन भीगी पलकों से। देखना फिर नया ख्वाब बनकर...
भर जाता तलवार का घाव, शब्दों का नहीं भरता है, शब्दों से मिले ज़ख्मो का, कहांँ कोई मरहम। भर जाता तलवार का घाव, शब्दों का नहीं भरता है, शब्दों से मिले ज़ख्मो का, कहांँ...
धिक्कारेगा तुम्हें ये कड़वा सच जिसे कहने से तुम डरते हो। धिक्कारेगा तुम्हें ये कड़वा सच जिसे कहने से तुम डरते हो।
दूर कहीं दिख रहा था एक अस्थि पिंजर, जिस पर रह गया था बस मॉंस चिपक कर। दूर कहीं दिख रहा था एक अस्थि पिंजर, जिस पर रह गया था बस मॉंस चिपक कर।
कहाँ बने उनके लिए कभी कोई अलग से 'कृपा भवन।' कहाँ बने उनके लिए कभी कोई अलग से 'कृपा भवन।'
सर्वाधिक महत्वपूर्ण है पुस्तक का वह पृष्ठ, जहां मुद्रित पुस्तक का अधिकतम खुदरामूल्य। सर्वाधिक महत्वपूर्ण है पुस्तक का वह पृष्ठ, जहां मुद्रित पुस्तक का अधिकतम खुदर...
मेरे हिंदू मुस्लिम बच्चों को आपस में लड़ाया जाता है मेरे हिंदू मुस्लिम बच्चों को आपस में लड़ाया जाता है
काव्य कुसुम कानन में कविता, कलुषित हुई कहो कैसे? काव्य कुसुम कानन में कविता, कलुषित हुई कहो कैसे?
कितनी ही कामनाएं मसली है मैंने अपने कोमल हृदय पर खिलखिलाती। कितनी ही कामनाएं मसली है मैंने अपने कोमल हृदय पर खिलखिलाती।
देखो उस पृथ्वी का मानव ने आज यह कैसा हाल किया है? देखो उस पृथ्वी का मानव ने आज यह कैसा हाल किया है?
खेतों से गांवों से कस्बों से शहरों से जैसे बसंत गायब खेतों से गांवों से कस्बों से शहरों से जैसे बसंत गायब
आज मैं गाँव से लौटा हूँ। मन में गहन पीड़ा लिए बैठा हूँ। आज मैं गाँव से लौटा हूँ। मन में गहन पीड़ा लिए बैठा हूँ।
कौन जाने किस किस कोख़ से, जन्म कुपुत्र का होता है। कौन जाने किस किस कोख़ से, जन्म कुपुत्र का होता है।
दुख की चादर ओढ़े कौन खड़ा है वो समय समय का फेर है बदल रहा है जो। दुख की चादर ओढ़े कौन खड़ा है वो समय समय का फेर है बदल रहा है जो।