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प्रीति प्रभा

Romance

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प्रीति प्रभा

Romance

दिल की बस्ती

दिल की बस्ती

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वो भी क्या दिन, क्या ज़माना था

तेरी गलियों में मेरा आना जाना था


सजा करता था चांँद तब मेरा दरीचे में

तेरी यादों का सुबह शाम ताना बाना था


कभी दरवाज़े की घंटी तो फेंके कभी कंकड़

वो किताबों, रिसाले तो बस एक बहाना था


तेरी फ़ुर्क़त मेरी जान लेती थी

तेरी कुर्बत का मैं दीवाना था


मैं तेरी हर बज़्म में परवाना था

तेरे दिल की बस्ती में मेरा ठिकाना था.


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