STORYMIRROR

प्रीति प्रभा

Abstract

3  

प्रीति प्रभा

Abstract

अनजान रास्ते

अनजान रास्ते

1 min
333

ये दुनिया है पागल खाना

हंँसी ख़ुशी से दिन बिताना


तेरी हर एक चाल को भाँपे

खिड़की पर पर्दे सजाना


दख़ल अंदाजी करेगा ये ज़माना

उन से दिल के राज़ सदा छुपाना


अनजान रास्ते है यहांँ जीवन के सभी

फ़िर भी मुस्कुरा कर है हमें चलते जाना


सभी को प्यार पैसों से है यहांँ

बहीखाता ना तुम किसी को दिखाना


कर लो जीते जी कुछ अच्छा काम

मरने के बाद सब यहीं है रह जाना।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract