STORYMIRROR

Shahwaiz Khan

Romance

4  

Shahwaiz Khan

Romance

दीवाना

दीवाना

1 min
215

तू ने जिस तरह दर्द को मेरा साथी बनाया है

वो दाग़ दिये के अब आईना भी नही देखता हूं मैं

मुझे मतलूब ज़माना था कभी

आज तन्हाइयों में बसर करता हूं मैं

तेरे ख़वाब मेरी आँखों को पत्थर कर गये

ऐसे बिखरा जीवन मेरा कि

किताबे दिल के पन्ने पन्ने बिखर गए

सुनता हूं

हर जगह चर्चे हैं तेरी फिर आमद के

तुने फिर कोई नया रूप धर लिया होगा

फिर कोई दिल चाहिये होगा खिलौना तुम्हें

फिर शायद किसी का नाम

सफ़े ख़ुशी से मिटाना होगा

क्योंकि

मेरी कहानी में नही आता कोई बड़ा काम

तूने ये सोच के पन्ना पलट दिया होगा

मुझे ही देखकर चाँद निकलता है

तेरी ही बात चलती है रात भर

ये दीवानगी है और कुछ नहीं

तूने पागल समझ लिया होगा

एक क़फ़स में क़ैद हूँ वरना

आसमाँ के लिए शाहीन अब भी हूँ में

जानता हूं में भले कुछ नहीं था तेरे लिए

एक लम्हें के अफसाने के सिवा तेरे लिए

मैं कुछ नहीं था मगर

जब दुनियाँ के किसी कोने में जानां

ना मिल सकें सुकूँ

ना मिल सके क़रार तुम्हें

एक बार

बस एक बार तुम मुझे पुकार लेना

तुम मेरा नाम लेकर

मुझे अपने साथ पाओगी

अपने हमराह 

क़दम बा क़दम।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance