धरती माँ
धरती माँ
चिखती है धरती धरा पर दया करो,
वेदना मुझे बहुत दे दी वात्सल्य का
मरहम लगा दो।
अपना पेट भरने के लिए माँ को
बंजर कर दोगे,
बेजान माँ की छाती की दरारें
तुम क्या देखोगे।
माँ की छाती से दूध नहीं जब
खून की धारा छलकेगी,
निर्दोष लाल के सजा मिले माँ की
आँखें क्या देखेगी।
दिन पर दिन तुम विकसित होते,
कहते हो हम कर रहे विकास।
इन द्रवित अस्रुओं से पूछो,
तुम सबका अब हो रहा विनाश।
जिन खग पतंग के कलरव से,
नित विश्व धरा गुंजित होती।
उनको आहार बना करके,
छाती तुम सबकी मुदित होती।
उस करुण पुकार को सुन करके,
कंठ मेरा भर जाता है।
माँ की ममता फिर पूछ रही,
तुम सबका कैसा नाता है ।
नदियों में कल -कल रहने दो,
झरनों को झर-झर झरने दो
फिर नित वसंत बन जायेगा,
तेरा आने वाला कल।
