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Love Kumar

Abstract

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Love Kumar

Abstract

चित्रकार

चित्रकार

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ये कौन बदल रहा है आकाश पर

बादल रूपी चित्रों को बार बार

भर देता है रंग देखते ही देखते


कुछ दूर जा रहे हैं

किसी परदेसी की तरह

मानो अंतिम मुलाकात हो कोई


कुछ जुड़ से गये हैं

खेत की मिट्टी की तरह

ऐसा लगता है किसी किसान ने

अभी अभी जोता हो अपना खेत


कोई जा रहा है कश्ती का आकार लिए

मानो भनक लग गई हो किसी तूफान की


कुछ जा रहे हैं सूफी कवियों की तरह

अलग से खोये किसी वियोग में


कुछ पिघल रहे हैं मोम की तरह

मानो सुन रहे हों कोई बीती व्यथा


कुछ बढ़े जा रहे हैं

सेना की टुकड़ी की तरह

बचाने अपने वतन को


दूर है एक बादल पेड़ बना

एक नीचे मां का रूप लिए

सहला रहा है गोद में बच्चे को


कुछ घूर से रहे हैं मेरी तरफ

जैसे मैं लिख न पाया हूं

उनके बारे में


शांत हैं सब चित्र पर बेचैन है मन

पूछ रहा है बार बार

ये कौन चित्रकार है...।


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