ढलती शाम
ढलती शाम
दूर किनारे पर अकेला बैठा है कोई
मार रहा है पत्थर पानी पर
एक एक कर
झांकता है कभी दूर पहाड़ी के उस पार
मन में लिए कुछ बेचैनी
कुछ इंतजार के लम्बे पल
वक्त भी जा रहा है उड़ा।
धुएं की तरह
कुछ बादल एक तरफ हो रहे हैं इक्टठा
किसी रंग में रंगन को
सूरज भी रंगों का अदृश्य सागर लिए
चला जा रहा है पश्चिम की ओर
कर रहा है रंगीन बादलों को
देखते ही देखते
धूल भी जा रही है धीरे धीरे
सिर से ऊपर
लौट रहे हैं सुबह के पक्षी भी
काली ठंडी रात में बिताने कुछ पहर
तैयार है रास्ता भी सफेद कागज की तरह
गायों के असंख्य पैरों की मोहरें लगने को
वृक्ष खड़े हैं शांत मानो
सुन रहे हों ढलती शाम की कोई गजल
चला आ रहा है काफिला
ऊंटों पर सवार, कुछ पैदल भी
थकी थकी आँखें देख रही हैं रास्ता
लिए कुछ सपने, कुछ आशाएं ।
