फुनगियों पर चांद
फुनगियों पर चांद
आसमान का इतना भार
कैसे सहा होगा
इन नन्हे पत्तों की फुनगि्यों ने
जो अभी अभी अवतरित हुई हैं
भवसागर को पार कर
सुबह ही नहा लेती हैं
किसी पवित्र संत की तरह
ओस की बूंदों में
मानो मुक्त के पट खुलते हैं
इन पर दर्ज इन्द्रधनुष से
जो ले चलते हैं
प्रकाशपुंज में बिठाकर
मोक्ष द्वार तक
इनके समक्ष झुकते हैं मेघ भी
किसी आज्ञाकारी शिष्य की तरह
तारों को भी देखा है
इनके इर्द गिर्द टिमटिमाते
मानो प्रकृति ने
भर दिया हो उजाला
दो अन्धेरे ग्रह चमक उठते हैं
ललाट की मानिंद
चन्द्र कलाएं
इनकी नोकों पर सवार
पूरे करती हैं अपने चक्र
चांद भी पूर्णिमा के दिन
चमकता है
किसी संत का ओरा बन
इनके अक्स से लिपटा
तब नजर आता है
दूधिया आकाश पर
स्वर्ग का रास्ता
नन्हीं नन्हीं फुनगि्यों पर
चांद ही तो मोक्ष द्वार है ।
