बूंदों की आवाज
बूंदों की आवाज
बरस रही है बूंदें रिम झिम
चांदनी में नहा नहाकर
उनकी आवाज में जादू है कोई
जल तरंग सी खनक लिए
कहीं पत्तों पर गिरती टिप टिप
तारों की सी चमक लिए
मधुर ध्वनि मंगल बेला सी
बिस्मिलाह की तुहरी मिठास ले
गिरती कहीं छप्पर के फूस से
मानो संगीत की कोई शाम हो
किसी फनकार के नाम हो
छम छम करती गलियारे में
गिरती कभी कागज की कशि्तयों पर
चुपके से गिरती भीगे तन पर
कानों में कुछ मूक सा कहकर
पानी पर छप छपकर
बुलबलों के संग बहकर
जादू है कोई प्रकृति चित्रण
मन में अमिट संसारिक सत्य सी
रिम झिम रिम झिम कर
गिरती कहीं गांव के पनघट पर
किसी आंचल से छिटक छिटककर
जल तरंग सी खनक लिए ।
