सवेरा
सवेरा
चल पड़ा है पक्षी समूह
पूर्व की ओर
नन्हें मुन्नों से बिछड़ कर
छिटक रही हैं ओस की बूंदें
घास की नोकों पर,
हल्के रंग भरने लगा रंगकर्मी
दिनकर जी
पृथ्वी के कैनवास पर
धीरे धीरे काले पहाड़ों पर
चढ़ने लगी सोने चाँदी की परतें
पेड़ खड़े किसी भक्ति गीत में
पंक्ति बनाकर छोटे बडे़ सब
झांक रहे पत्थर भी छुप कर
किनारे की ओट से
नहाती नदी को, लजाती नदी को
कृषकजन भी चल पड़े हैं
चिड़ियों की चह चह मच जाने पर
पगडंडियों पर कोहरा बिछा है
रजत रास्तों का निर्माण हो रहा
चल पड़ा कभी ना रुकने वाला
धरती पर खींचने
किस्मत की लकीरें
नहा ली है सारी प्रकृति
बैठेगी पूजा में मानो
कहीं पवित्र मन से
हवा चली ठंड की चादर ओढ़े
महक रही है अलसी और तुलसी
सरसों सिर पर बांध मुरैठा
नाच रही प्रातः उत्सव में
लहरों पर अनोखा संगीत बज उठा
चल पड़ी है बत्तख, जलमुर्गी
अपना अपना तानपूरा लिए
प्रकृति ही सुनती है
नये राग की नई तरंगें
जग उठती हैं तन और मन में
नये सपनों की नई उमंगें
चल पड़ते हैं सूरज बाबा
सिर पे संतों का सा ओरा लिए
दिन भर चलते हैं अपनी राह पर
कल फिर आने का वादा कर ।
