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Love Kumar

Abstract

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Love Kumar

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एक शाम ढली

एक शाम ढली

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एक शाम ढली

नयन न्यौछावर

आशीष को आतुर

मांगे प्रकृति से

हर पल हर पल

नवल रंग

संग मधुर मनमोहन

चित्रशाला


मेघ समूह का

गान समारोह

नित नियम का

पालन करता


स्वर्ण कण

गोधूलि से उठे

फैले क्षितिज के अंबर में

लालमणि लालिमा

पेड़ो के पीछे

करती उत्सुक कृषकजन को


थके नहीं बैलों के कन्धे

लगता है अब

अंबर की बारी


पक्षी लौटे

महका घर आंगन

शांत हुई

एक युग की चह चह


चहुंदिशा में पच्छम चमका

बैठा अदृश्य

चित्रकार कोई

सहज सहज मन रिझता

करता विहंगम

चित्रकारी


दृश्य अदृश्य

कुछ पल रुक जाते

सिमटे नहीं अभी

दो नेत्र में

करूं नमन

इस पवित्र मन से।


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