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Love Kumar

Inspirational

4  

Love Kumar

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प्रभात की दस्तक

प्रभात की दस्तक

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फूट रहा है

नया प्रभात

धीरे धीरे

किसी अंकुर सा


उतर रही

अन्धेरे की चादर

दिनकर जी के

तन मन से


ओस की दस्तक

मखमल करती

नन्ही पत्तियां

लगी मोती पिरोने


पंछी कर रहे तैयारी

एक नये सफर की

निकल लेते हैं,

जल्दी ही

किसी नन्हे की

चिंता का बोझ लिए


बादल बदल रहे हैं

रंग बिरंगे

वस्त्र तन के

सज धज रहे हैं

आज के

नव उत्सव के लिए


पेड़ पहाड़ों पर पंक्तिबद्ध

लगे प्रार्थना करने

मिल रहे गले

छोटे बडे़ सब

लगते मित्रगण से


नदी नहाकर

पहुँच रही

मंदिर की सीढ़ी को छूने


दूर पूर्व में सूरज निकला

सीधी किरणों का

उजियारा ले,

चल पड़ा

अंतहीन सफर पर

नंगे पांव,

एक मुसाफिर सा ।


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