छलावा रिश्तों का
छलावा रिश्तों का
जिस बोतल का पानी तृप्त होने के लिए
गंगा जल समझ कर पी लिया था
खुबसूरत बोतल सुंदर लेबल
मन विश्वास से भर गया था
अरे ! ये क्या हुआ ?
पीते ही पानी
शरीर बीमारियों का शिकार हुआ,
दुआ पढ़ी दवा चली
परंतु सब बेअसर
उस पर किसी की
कुछ ना चली,
शरीर बेदम हुआ
किंतु हौसला नहीं पस्त हुआ
मन ने सोचा
एक ज़रा से पानी से कैसे
शरीर टूट सकता है ?
मन अड़ा है तो
शरीर भी खड़ा हो सकता है,
आज इस बात को
साल दर साल बीत गया
वक्त के साथ
शरीर मशीन हो गया
पर मन बेचारा
कहीं रीत गया,
उस पानी पर शोध जारी था
रोज नये परिणाम आते
और अचंभित कर जाते
जब अंतिम परिणाम आया
तो पता है क्या पाया ?
वो गंगा जल की
बोतल का पानी नकली था
परंतु उस पर लगा
लेबल असली था।
