चाय
चाय
ख्वाहिशो की सूची में
एक ख्वाहिश बाकी रह गई
संग तेरे एक कप चाय पीने की
अरमां अधुरा रह गया
आते ही ऋतुराज वसंत
याद आये पुराने दिन
सूरज की तपिश में मंडराना
ख्वाबों की चांदनी रातों वाले दिन
प्नवाहिनी तीरे की सच्ची झूठी
मन बहलाऊं बातों वाले दिन
या यूं कहें कि
निरर्थक सपनों के सार्थक बातों वाले दिन
जब जब बादल गरजता है
मोर नयना भी संग बरसती है
देख चहूं ओर अमावस
अंदर ही अंदर जी घुंटता है
जी चाहता है पंछी की तरह
तेरे प्रांगण उड़ आऊं
कर चाय का अमृतपान
फुर्र से छत से उड़ जाऊं
पर जालीम सी दुनिया में
एक डर भी लगता है
समझ दिलफेंक
कोई ईंटा पत्थर फेंक न दे
और बिन सुने दिल की दास्तां
अरमानों का पर कतर न दे
फिर मन मारकर बैठ जाता हूं
अपने मन को बारम्बार समझाता हूं
फिर चाय की जगह
लेमन टी कलर सी
कड़वी पेय गटागट पी जाता हूं
कभी कभी सोचता हूं
कितना मुश्किल है
अपनों को
अपनी ही बात समझाना
और इससे भी ज्यादा
उन यादों को सहेजना
जिसे यथार्थ की तरह जिया करते थे!

