बृज फाग
बृज फाग
ओ सांँवरों ...मो पै डारो ना अबीर...
छोड़ देउगी.. ..मैं नैनन के तीर.....
माना.. तू है ब्रजराज कृष्ण.......
मैं ठहरी बृजबाला ..तोसे लागी मेरो प्रीत...
खेलियो फाग बचाई के.. घूंँघट न मारो टारयो.....
भर मारौ पिचकारी अबीर.. मोरे कटीले नैन बचाए के..
गुलाल कुमकुम केसर..मैं तोहै लगाऊंँ.....
टेसू संग बसंती में भीगी.. मैं खुद को जिन जिन पाऊंँ..
ओ माधुर्यमय .. पहलो रंँग तो मोहै डारियो....
छैल छबीले ...इ फाग कतहूँ ना कबौ बिसरायौ...
केसर रंँग में लाल भई रे ..कोरे कलश में डुबाई के..
खेलन मैं तोसे आई ..होरी सबसे नजर बचाई के..
चुनरी भीगौ..लहंगा भीगौ.. छूटयो किनारी रंँग..
तेरो अधरन पर बंँसी जैसे ..बसयो मोरे अंँग और संँग
हे मधुसूदन छीटन की रंग बिरंगी फुहार इ संसार पे डरियो
रंँग जाएँ सगरों तरि के भव सागर से पार उतरियो।
