बिलकुल वहीँ से
बिलकुल वहीँ से
जब बात होती हैं इशारों में,
कुछ अफसानों और स्वर्णिम पलों की शुरुआत होती बिलकुल वहीँ से.
जो सुने ना किसी ने कभी, जो कहे ना हमने कभी,
उन अद्भुत तरानों की झड़ी सी लग जातीं बिलकुल वहीँ से
जब दरवाज़ा खोलते हैं वो,दिल में सैलाब सा उठता भावनाओं का,
शांत समंदर में एक अशांत सुनामी का आगाज़ होता बिल्कुल वहीँ से.
देर रात में गहन सोच में डूबा होता जब तन्हा ये दिल,
दिल की बात कहने को जब सजती ख्वाबों मेँ हमारी बातों की महफ़िल,
आहत मन को मिल जाती राहत और एक सुकून भरी सांस का आगाज़ हो जाता बिलकुल वहीँ से.
मिलने को उनसे जब कभी दिल तड़पता बेइंतहा,
बस पुकार के उनका नाम मन ही मन मेँ,
परवाज़ बन कर उड़ जाता नादान यें दिल मेरा ,
साधारण हों ही नहीं सकता वो
जिसके सौजन्य से साफ- साफ दिखने लग जातीं हर मंज़िल,
जो चाहे अनचाहे ही बन जाता जीवन-यापन की एकमात्र वजह,
ऐसे ख्यालों का,ऐसे असंख्य जज़्बातों का
बवंडर सा उठता और उमड़ता दिल में बिलकुल वहीँ से.
बस उसी अनोखे व्यक्ति के लिए आहें भरने का सिलसिला जारी होता जब कभी भी,
नाम पुकार के जिसका लगता जैसे भटकती प्रेमिका को मिल जाता कारवां बिलकुल वहीँ से,बिलकुल वहीँ से...

