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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Tragedy

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Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Tragedy

“ बहुत कुछ खोते जा रहे हैं ”

“ बहुत कुछ खोते जा रहे हैं ”

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अब तो बातें

करने को तरसते हैं

किसी को कुछ

लिखने से डरते हैं

फोन पर बातें

भला कौन करतें हैं 

सब आज कल दूरियाँ

बना के रखते हैं

हम अपनों में

सिमटते चले गये

दूसरे तो दूसरे अपने भी

दूर होते चले गये

किसी को

समझना है मुश्किल

किसी को

जानना है मुश्किल

दिखते कुछ और हैं

निकलते कुछ और हैं

रहते कहीं और हैं

कहते कुछ और हैं

कई यों ने तो

मर्यादा को त्याग दिया

अपनी सभ्यता

और संस्कृति को छोड़ दिया

शालीनता और शिष्टाचार

किताबों में ही रह गये 

बड़े छोटे का भेद भूल कर

मित्र सारे बन गये

प्रणाम ,अभिनंदन और

स्नेह की परंपरा कहाँ गयी

आत्मीयता और सम्मान की

भंगिमा मानो लुप्त हो गयी

हम निश्चित ही

सफलताओं के शिखर पर जा रहे हैं

पर गौर से देखिए हम

“ बहुत कुछ खोते जा रहे हैं।”



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