भरोसा
भरोसा
भरोसा
किसके भरोसे कदम उठाऊँ,
आपको समझ नहीं आता,
क्योंकि जो ख्यालों में आता है,
वो हकीकत में नहीं आता।
होंगी शायद कुछ मजबूरियाँ,
पर मजबूरियों का भरोसा कैसे करें,
सपनों का टूटना समझ आता है,
पर ख्वाब का टूटना...
ख्वाब के टूटने से क्यों न डरें।
यूँ तो तमाम मुश्किलें हैं राहों में पर,
अकेले में सफ़र और कठिन हो जाता है,
उसे तो मेरी मुश्किलों को कम करना चाहिए था,
अगर दिल में कोई बात थी,
तो कम से कम ज़ुबान से बताना चाहिए था।
फिर देख लेते कि कैसे पार होंगी मुश्किलें,
क्योंकि हर मुश्किल का हल होता है,
आज को सुधारने वाले ही समझते हैं,
कि हर बीते कल का एक आने वाला कल होता है।
मान लिया मैंने उसे कि...
वो मेरा बीता कल, आज और आने वाला कल है नहीं,
वही मेरी मुश्किल है,
और वही मेरी सारी मुश्किलों का हल है।
पर कैसे करूँ मैं एक-तरफ़ा भरोसा,
जो ख्यालों में आया पर हकीकत में कभी आया ही नहीं,
जो बातें मुश्किलें हल कर सकती थीं,
वो कभी उसने मुझे बताया ही नहीं।
अब उसे क्या कहूँ जब मेरा,
खुद से ही भरोसा टूट रहा है,
खुद को खो दूँ या खुदा को ढूँढ लाऊँ,
पर शायद अब सब कुछ खुद ही छूट रहा है।
तकदीर के हाथों टूटने वाले,
हर बार तकदीर पर भरोसा करते नहीं हैं,
जीने की वजह छीन जाने के बावजूद,
वो जीने से डरते नहीं हैं।
