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Mumtaz Hassan

Children


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Mumtaz Hassan

Children


बदनसीब बचपन

बदनसीब बचपन

1 min 14 1 min 14

मैं-एक छोटा सा बालक हूं

बाल्यकाल में भी अपना बचपन नहीं देखा-मैंने


बालश्रम की अंधकारमय दुनिया में,खो गया है बचपन मेरा


गरीबी ने किया- शिक्षा से वंचित मुझे

सुबह- पौ फटते ही निकल पड़ता हूं- काम की तलाश में


चिमनियों/भठ्ठियों/ फैक्ट्रियों में, कल कारखानों /होटलों ढाबों में झुलसता ह

दिनरात बचपन मेरा- दो जून की रोटी खातिर


खाने पड़ते हैं अक्सर- मालिक के डंडे ,

आए दिन सहन करता हूं जाने कितने ही शोषण/ जुल्मों-सितम मैं,

ठोकरें खाता हूं दर दर की रोज ही

समाज दुत्कारता है मुझे, करता है दृषिपात-हेय दृष्टि से क्योंकि गरीब / बदनसीब बालक हूं मैं


समाज के तिरस्कार का कड़वा घूंट पी पीकर जीता हूं-नित्यदिन


और कर भी क्या सकता हूं -पापी पेट का सवाल है बाबू,

तुम का ...जानो पेट की जलन को,तुमने तो गरीबी देखी ही नहीं


नित्यदिन-एक सपने मरते हैं मेरे/ भूख की सूली पे चढ़ा देता हूं-शौक अपने सारे......


कभी कभी-मन ही मन कोसता हूं खुद को,भाग्य को

और उस सृष्टि निर्माता को -जिसने.......


जीवन तो दिया , परन्तु जीने का अधिकार नहीं दिया हमको......!!



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