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Dr.Padmini Kumar

Classics

4  

Dr.Padmini Kumar

Classics

बचपन की एक याद

बचपन की एक याद

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बचपन की एक याद:
चार साल की उम्र थी मेरी,
नन्हीं सी मेरी काया,

हाथ पकड़कर अम्मा का,
मैं पानी लेने जाकर आया।

नहर किनारे पानी चमका,
कुए से वो पानी लाए,

कमर, सर और हाथों में,
मां तीन घड़े भरकर लाई।

मेरे हाथ में छोटा घड़ा था,
मैं भी कदम बढ़ाती थी,

छलछल करते पानी संग,
मैं हंसती-मुस्कुराती आती थी।

तभी राह में दिखी एक गली,
जो सूनी और वीरान थी,

कोई नहीं था आता-जाता,
मैं देख उसे हैरान थी।

घर आई तो देखा पापा,
सीढ़ी पर बैठे अखबार पढ़ते,

पूछा उन्होंने, "गई थी मां संग?",
मैंने कहा, "हां, जिद किए।"

"पापा! वो जो सूनी गली थी,
क्यों कोई वहां न जाता है?"

पापा बोले, "सुनो बिटिया,
 वहां का रास्ता घबराता है।"

"वहां न जाना कभी भूलकर,
वो रास्ता बड़ा खतरा है,

दंगे की वो आग पुरानी,
 जिसमें हर दिल बिखरा है।

दस साल पहले हिंदू-मुस्लिम,
आपस में थे खूब लड़े,

खून बहा था इस मिट्टी पर,
पुलिस के पहरे थे खड़े।"

"शांति का फिर हुआ समझौता,
बंटी गलियां और मकान,

अलग गली में रहने लगे,
इस बस्ती के मुसलमान।

पापा बोले, सीमा पर भी,
सरहद की एक जंग है,

हिंदू-मुस्लिम के झगड़े से,
अपना भारत तंग है।"

पापा की बातें सुन-सुनकर,
 मेरा छोटा सा मन चकराया,

सरहद क्या है, नफ़रत क्या है,
कुछ भी समझ नहीं आया।

पापा बोले, "देर हो रही,
अब तुम स्कूल को जाओ,

बस्ता उठाओ, वर्दी पहनो,
 जल्दी से तैयार हो जाओ।"

दौड़ते-भागते स्कूल पहुंची,
कक्षा में जब बैठी जाकर,

सारी बातें भूल गई मैं,
अपनी सहेली को पाकर।

पास ही मेरे बैठी हुई थी,
उसकी प्यारी सी आवाज़,

हम दोनों साथ पढ़ते-खेलते,
उसका नाम था
मुमताज़


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