STORYMIRROR

Dr.Padmini Kumar

Classics

4  

Dr.Padmini Kumar

Classics

चलते काल चक्र में ही है अचल।

चलते काल चक्र में ही है अचल।

1 min
9

कविता का शीर्षक: चलते काल चक्र में ही है अचल।

 कल जो कली थी, आज फूल हैं।
 कल जो जमीन था,आज मकान हैं।
 सूरज ढलकर चांद लाता है,
 सवेरे के पीछे शाम को आता है।
 मानव!न घबरा बदलते शासनों से,
 न डर बदलते इंसानों से।
 हर पल नया, हर पल बदला,
सृष्टि का यह मौन रहस्य है।
 चलना ही जीवन का सत्य है।
 चलते कालचक्र में ही अचल है।

 डाॅ.पद्मिनी कुमार चेन्नई


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics