काला सोना
काला सोना
कविता - 'काला सोना'
दूर क्षितिज तक फैली रेत,
और ऊँटों की टोली,
अरब की धरती ने आज,
अपनी किस्मत है खोली।
जहाँ कभी बस प्यास थी,
और गर्म हवा का पहरा,
वहाँ दबा है सीने में,
'काले सोने' का राज गहरा।
चट्टानों के नीचे छिपकर,
लाखों साल बिताए,
सागर के उन अवशेषों ने,
नए रूप दिखाए।
दम्माम के उस कुएँ ने,
जब पहली धार बहाई,
रेगिस्ताँ की धूल में,
फिर दौलत की चमक आई।
आज इन्हीं पाइपलाइनों से,
दुनिया की धड़कन चलती है,
अरब के तेल से ही तो,
प्रगति की मशाल जलती है।
जहाँ बहती थी कभी सभ्यता की शीतल धारा,
आज वहाँ बारूद का धुँआ है,
और बेघर है सहारा।
खजूर के पेड़ों की छाँव में
अब, सन्नाटा पसरा है,
बचपन की किलकारियों पर,
मिसाइलों का पहरा है।
पूछ रही है इंसानियत,
क्या यही उन्नति के जवाब हैं?
तेल की इस दौलत ने क्या,
मिशैल ड्रोन रूप ले लिया है?
प्रथम खाडी युद्ध ने शुरु हुआ था
सब से अमीर देश कुवैत में,
सद्दाम कुशैन के निर्दय आग के कारण
काले बादल ने सूरज को भी भगा दिए।
कभी लेबनान जलता है,
तो कभी यमन की चीखें आती हैं।
आज ईरान और इस्रेल मिशैल डालते हैं।
राजनीति की इस बिसात पर,
सिर्फ जानें ही जाती हैं।
मिटा दो ये नफरत की दीवारें,
और बंद करो ये हथियार,
रेगिस्ताँ की तपन मांगती है,
अब शांति की बौछार।
ताकि फिर से रेत सागर पर,
शांति का कबूतर बोले,
अरब की यह पावन धरती,
फिर से खुशहाली के पट खोले।
