गाँव की महिला एवं शहर की महिला
गाँव की महिला एवं शहर की महिला
एक धूप-पसीने में तपकर खेतों में अन्न उगाती है,
गोबर, गारा, चूल्हे की आँच में अपना जीवन बिताती है।
साहज उसका इतना भारी, कि हर तूफ़ान सह जाती है,
सच्ची संस्कृति का दर्पण, वो गाँव की गोद कहलाती है।
शहरी फ़ाइलें, गोष्ठी और मोबैल में हाथ आज़माती है,
मेट्रो,फ्लैट की रफ़्तार से चलकर, वो आसमाँ को छू जाती है।
जींस-टीशर्ट या साड़ी हो, वो हर लिबास में जचती है,
बराबरी और आज़ादी की, वो नई कहानी लिखती है।
रूप अलग हैं, ढंग अलग हैं, पर दोनों का दिल एक है,
नेह, समर्पण, त्याग, शक्ति का दोनों ही प्रतीक हैं।
एक नींव की ईंट बनी है, दूसरी शिखर सजाती है,
दोनों मिलकर ही इस जग को सुंदर स्वर्ग बनाती हैं।
───
